शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

अब इस कदर भी उजाले न हो---

इस कदर भी उजाले न हो।

घर आग के निवाले न हो।


प्यासे हलक से गुज़रे न जब तलक,

नदी समन्दर के हवाले न हो।


बोल प्यार के हों ग़ज़ल की राह में,

मस्जिद
न हो और शिवाले न हो।


सूरज अबके ऐसी भी धूप न बाँटे,

कि पहाड़ पर बर्फ़ के दुशाले न हो।


खुशियों की मकड़ियों का वहाँ गुज़र नहीं,

ग़मों के जिस घर में जाले न हो।


इस हमाम में सब नंगे नज़र आएंगे।

सच की ज़बान पर जो ताले न हो।

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