मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

पैमाना न दरमियान रख....

 पैमाना न दरमियान रख।

 मेरे ख़्यालों में उड़ान रख।


दिल से दिल का फासला न हो,

 इस सलीके से गीता और कुरान रख।


बहुत हुई महलों की फिक्र, छोड़ दे,

बेघरों के हिस्से में अब मकान रख।


बस्तियां रौंद लेगी ये नदी रोकी हुई,

ज़रूरत से ज़्यादा न तू अपना विज्ञान रख।


अश्ललीलता को जो तालीम मान बैठै हैं,

उन बच्चों के ज़हन में बड़ों को सम्मान रख।


तिलमिला उठा वो मेरी इस गुज़ारिश पर,

कि मेरे होठों पर भी थोड़ी मुस्कान रख।

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