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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

कुल्लू में गुरुकुल सम्मान समारोह में सम्मानित हुई विभूतियाँ,

गुरू कुल सम्मान से सम्मानित विभूतियाँ
कवि अग्निशेखर अपने विचार रखते हुए
गुरूकुल बहुमुखी शिक्षा संस्था कुल्लू द्वारा 14 अप्रैल को आयोजित सम्मान, लोकार्पण और कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में अनेक कवियों ने भाग लिया और विभिन्न क्षेत्रों के लिए सात साहित्यिक विभूतियों को सम्मानित किया गया। इन विभूतियों में लोकगीतों के लिए लायक राम रफीक, कहानी लेखन के लिए हंसराज भारती, लोकप्रिय कवि के लिए तेजराम शर्मा अजेय को उनके नव प्रकाशित काव्य संग्रह “इन सपनों को कौन गाएगा”  कृष्ण चन्द महादेविया को लोक संस्कृति के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए के समानित किया गया| कुल्लू से प्रकाशित पत्रिका 'हिमतरु' के प्रकाशन के लिए कृष्ण श्रीमान को सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र 'हिमाचल दस्तक' की खूब सराहना हुई। यह हिमाचल का एकमात्र ऐसा दैनिक समाचार पत्र है जिसमें 'अभिव्यक्ति' नामक पन्ने पर एक विशिष्ट साहित्यिक व्यक्तित्व पर विशेष इंटरव्यू रविवार को प्रकाशित किया जाता है। इस कार्य को लेकर समाचार पत्र के सम्पादक हेमंत कुमार 'अभिव्यक्ति' परिशिष्ट के सूत्रधार, युवा पत्रकार रजनीश को भी सम्मानित किया गया। 
मुख्य अतिथि देवेन्द्र गुप्ता साहित्यकारों को सम्बोधित करते हुए
                पुस्तकों के लोकार्पण में तेज राम शर्मा के ताज़ा काव्य संग्रह “ मोम के पिघलते बोल”, संजू पॉल की पुस्तक “स्माईल दाई सॉरोज़”, ईशिता गिरीश की ‘सबसे अच्छा बच्चा’ कृष्ण चन्द्र महादेविया की “मण्डी जनपद के लोकनाटय” सतीश रत्न का काव्य संग्रह ‘सुबह ज़रूर आएगी’, तथा राज्य वद्धन द्वारा संपादित काव्य संकलन ‘स्वर एकादश’ का लोकार्पण किया गया। इसके अतिरिक्त एक वीडियो सीडी का लोकार्पण भी इस आयोजन में किया गया। तेजराम शर्मा की पुस्तक पर  ने पर्चा पढ़ा, ईशिता की पुस्तक पर सतीश चन्द्र कौड़ा,  अजेय के काव्य संग्रह पर निरंजन देव शर्मा, मंडी जनपद के लोक नाटय पर गंगा राम राजी, सतीश रत्न के काव्य संग्रह और राज्य वर्द्धन द्वारा संपादित काव्य संग्रह  पर प्रकाश बादल ने पर्चा पढ़ा ।  कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भाषा एवम संस्कृति विभाग के निदेशक देवेन्द्र गुप्ता थे और कार्यक्रम की अध्यक्षता  प्रसिद्ध कवि अग्निशेखर ने की।        
कविता पाठ करते कवि
दो सत्रों में निर्धारित किए गए इस आयोजन को एक सत्र में निपटाने की जब मंच से घोषणा हुई, तो बहुत से साहित्यिक मित्र मन मसोस कर रह गए। पता चला कि इस आयोजन को समेटने के पीछे उसी स्थान पर मुख्यमंत्री के नागरिक सम्मान के लिए चुना गया था। इसी के चलते साहित्यकारों को यह अल्तीमेटम दिया गया कि हॉल को जितना जल्दी हो सके खाली कर दिया जाए। इस तरह एक और सहित्यिक आयोजन की बलि चढ़ने ही वाली थी कि आयोजन के मुख्य संयोजक गणेश भारद्वाज ‘गनी’ के उत्साह का साथ साहित्यकारों और श्रोताओं
कवि सम्मेलन में प्रतिभागी कवि 
और उपस्थित साहित्यकारों ने नहीं छोड़ा। और खाली पेट सांय 5 बजे तक डटे रहे। इस आयोजन के पीछे गुरूकुल संस्था की कल्पना को साकार करने में जुटे गणेश भारद्वाज के प्रयास जहाँ सराहनीय थे वहीं इसकी बेहतर रूपरेखा न होने के कारण आयोजन  में अनेक खाभियां भी झलकीं, ज़ाहिर है आगामी गुरूकुल सम्मान के लिए इस आयोजन से सबक लिया जा सकेगा। विभिन्न विभूतियों को सम्मानित करने का जज़्बा लेकिन बेहद सराहनीय कदम है।
                       
स्कूली बच्चे कविता पाठ करते हुए
कवि सम्मेलन ध्यान खींचने वाला था। कवि सम्मेलन में रंग जमना तब शुरू हुआ जब यादवेन्द्र शर्मा ने अपनी कविता ‘पहाड़ी टोपी’ सुनाई। टोपी के इतिहास और राजनीतिक गलियारों में बदलते टोपी के रंग ऐसे बिखरे कि भाषा विभाग के निदेशक इस बीच कवि गोष्ठी से उठ कर ही चले गए । कवि सम्मेलन निरंतर चलता रहा और मोहन साहिल की ‘ गुच्छी’ कविता ने समां बांधा । कुल राजीव पंत की कविताएँ भी खूब जमीं । इसके अतिरिक्त तेज राम शर्मा ने भी कविता पाठकर ध्यान आकर्षित किया। अग्निशेखर को जिस तरह से सुना जाना चाहिए था सुना नहीं गया, लेकिन उन्होंने कुछ कविताएँ ज़रूर पढ़ी। इसके अतिरिक्त सतीश रत्न, निरंजनदेव,ईशिता, कृश्न चन्द महादेविया, शेर सिंग मेरुपा, सहित अनेक कवियों ने कविताएँ पढ़ीं। कुछ स्कूली बच्चों की कविताएँ भी ध्यान आकर्षित करने वाली थी। पूरे कार्यक्रम को नोट नहीं कर पाया इसके लिए क्षमा। लायक राम रफीक और अजेय सम्मान प्राप्त करने स्वयं उपस्थित नहीं हो पाए। अजेय के पिता ने अजेय का पुरस्कार प्राप्त किया और भाव पूर्ण संबोधन दिया।

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

अनुराग के प्रयासों से पूरा हुआ धर्मशाला स्टेडियम का सपना


अनुराग ठाकुर
27 जनवरी 2013 आखिर एक ऐतिहासिक दिन बन ही गया। यह हिमाचल के एक मात्र अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम की सूचि में आ गया। भारत और इंग्लैंड के बीच हुए एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच ने इस ऐतिहासिक दिन पर मोहार लगा दी। मैच के दौरान धर्मशाला स्थित इस स्टेडियम की सुन्दरता की प्रशंसा हर कोई कर रहा था। हज़ारों लोगों की तादाद में खचाखच भरे स्टेडियम में तालियों की गड़गड़ाहट और जश्न भरा शोर-शराबा था। इसी ऐतिहासिक दिन की एक और रोमांचक कड़ी ये थी कि हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल एक साथ इस जश्न में शरीक थे ।  अब धर्मशाला तिब्बत की निर्वासित सरकार की वजह से नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम की वजह से जाना जाने लगा है । 
                
धर्मशाला क्रिकेट स्टेडिम का मनमोहक दृष्य 

धर्मशाला में क्रिकेट स्टेडियम बनाने का सपना देखने वाले पहले व्यक्ति हैं अनुराग ठाकुर। कहावत भी है कि सपने देखना आम आदमी के बस की बात नहीं, ( बात उस सपने की हो रही है जो खुली आँख से देखा जाता है), और जो सपना देखता है, वही उसे पूरा करने की सोचता भी है। उसका प्रमाण हमारे समक्ष धर्मशाला में बना क्रिकेट स्टेडियम है । 17 जववरी 2013 को जब स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था तो  लोग उल्लास से भरे हुए मैच का आनन्द ले रहे थे और मेरा ध्यान इस  उल्लास के लिए सपना देखने वाले उस युवा पर था जो इस भीड़ का एक हिस्सा मात्र था, एक कोने में बैठा हुआ, चाय की चुस्कियां लेता वह युवा अनुराग ठाकुर । ज़ाहिर है इस सपने को पूरा करने में हिमाचल सरकार, हिमाचल क्रिकेट एसोसिएशन के अन्य सदस्य और अनेक व्यक्ति होंगे जो इसमें सहभागी बने, लेकिन सपना ही न होता तो किसे साकार करते ?  इसीलिए बहुत से विद्वान सपना देखने पर ज़ोर देते हैं, परंतु सपना देखना आम आदमी के बस की बात भी नहीं।
धर्मशाला स्टेडियम में विजेता भारतीय टीम का फ़ोटो

हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के इतिहास पर जाएँ तो इसका गठन वर्ष 1960 में ही हो गया था और और सन 1984 में एसोसिएशन को बीसीसीआई की सदस्यता भी मिल गई थी, लेकिन एसोसिएशन काफी शिथिल अवस्था में थी। 2 जुलाई 2000 को जैसे ही एसोसिएशन की अध्यक्षता के लिए अनुराग ठाकुर को चुना गया, एसोसिएशन में एक ऊर्जा का संचार हुआ, अनुराग ने अध्यक्ष पद पर विराजमान होते ही हिमाचल में क्रिकेट की संभावनाएँ तलाशने का बीड़ा उठा लिया । 
पहले अंतर्राष्ट्रीय मैच(भारत और इंग्लैंड )में पुरस्कार वितरित करते हिमाचल के मुख्यमंत्री व अन्य

यही वक्त था कि अनुराग ने हिमाचल क्रिकेट स्टेडियम  स्थापित करने की सोची और हिमाचल के खेल प्रेमियों ने भी उनका भरसक साथ दिया। मार्च 2002 में 16 एकड जमीन पर स्टेडियम बनाने के लिए हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने जब स्वीकृति दी और ज़मीन के काग़ज़ात हिमाचल प्रदेश क्रिकेटर एसोसिएशन के प्रधान को  सौंपे गए तो अनुराग तभी मान गए थे कि स्टेडियम का निर्माण अब और भी आसान हो गया था, लेकिन इसे पूरा करना कितना मुश्किल हो सकता था, ये तो आसानी से ही महसूस किया जा सकता है, लेकिन अनुराग की टीम ने धर्मशाला स्टेडियम को बनाकर क्रिकेट के प्रति अपनी तत्परता और विषेष रुचि का प्रमाण दिया है। बताया जाता है कि स्टेडियम निर्माण में 60 करोड़ की लागत आई, फलस्वरूप यह हिमाचल का अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस एक आकर्षक स्टेडियम बन गया। लगभग  25000 दर्शकों के बैठने  की क्षमता वाले, धौलाधार की  चोटियों से घिरे इस स्टेडियम की सुन्दरता देखते ही बनती है। 

धर्मशाला स्टेडियम की ताज़ा फोटो

हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन जहाँ क्रिकेट प्रेमियों में उत्साह का कारण बनी हुई है, वहीं अनुराग ठाकुर की अध्यक्षता में यह एसोसिएशन एक के बाद एक मील पत्त्थर  स्थापित कर रही है।  अनुराग हिमाचल प्रदेश के नादौन और बिलासपुर में भी ऐसा ही एक  स्टेडियम स्थापित करना चाहते हैं, जिसके लिए लगभग पाँच करोड़ रुपयों की ज़रूरत है। इंग्लैंड और भारत के बीच धर्मशाला में हुआ प्रथम अंतर्राष्ट्रीय मैच कई मानों मे ऐतिहासिक रहा। अनुराग ने इस दिन भी बिना किसी राजनीतिक दृष्टि से हिमाचल के मुख्य मंत्री वीरभद्र सिंह और पूर्व मुख्य मंत्री प्रेमकुमार धूमल को एक मंच पर ला खड़ा किया। अनुराग जैसे युवाओं की हिमाचल को आवश्यकताहै । हिमाचल में क्रिकेट का भविष्य अनुराग की आँखों में दिखाई दने लगा है। अनुराग के इस प्रशंसनीय कार्य के लिए उनकी पीठ थपथपाना यद्यपि एक छोटा सा प्रोत्साहन होगा, लेकिन उनके लिए  यह दुआ भी की जा सकती है कि ऐसे हसीन सपने देखने का उनका दृष्टिकोण कायम रहे और उनका जीवन कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ता रहे। इस लेख में पाठक अपनी राय जोड़ेंगे तो ज़ाहिर है कि अनुराग के लिए हिमाचली लोगों की एक शाबाशी तो होगी ही, साथ ही साथ उन तक यह संदेश भी जाएगा कि सब उनके सफल जीवन की कामना कर रहे हैं और सब प्रदेशवासी प्रदेशहित के लिए कार्य कर रहे हर व्यक्ति की पीठ थपथपाना जानते हैं। शाबाश अनुराग।

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

शिमला में 'बाघ की वापसी'

'बाघ की वापसी' का टाईटल पेज 
सात जनवरी 2013 को गेयटी थियेटर में फिर रंग भर गए। ये रंग कविता और कहानियों के रंग थे। मौका था, वरिष्ठ साहित्य्कार अवतार एनगिल के काव्य संग्रह ‘बाघ की वापसी’ और कहानीकार अरुण भारती के कहानी संग्रह ‘अच्छे लोग-बुरे लोग’ का विमोचन। ‘उत्स’ संस्था इस आयोजन में सारथी बनी और तुलसी रमण को आयोजक के रूप में देखा गया। भाषा विभाग के निदेशक, राकेश कंवर इस मौके पर मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे। उपस्थित कवि मण्डली में शिमला और इसके दुर्गम क्षेत्रों से आए साहित्यकार सभागार में विराजमान थे। विधिवत विमोचन हुआ और फिर अरुण भारती ने अपनी कहानी पढ़ी, इसके बाद अवतार एनगिल से भी कुछ कविताएँ पढ़वाई गईं। लेकिन बहुत से लेखक चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाए, कारण समय का अभाव बताया गया और आनन-फानन में आयोजन निपटा लिया गया।  अवतार एनगिल और अरुण भारती की कविताओं और कहानियों पर  लेखकों की ओर से कोई टिप्पणी नहीं आ सकीं।  बहुत से लेखकों के पर्चु शिमला के माईनस तापमान की ठंडी के बीच जेब से बाहर आने में कतराते रहे । 
विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि  भाषा विभाग के
 निदेशक राकेश कंवर, (बीच में)  'उत्स'  के अध्यक्ष तुलरी रमण(दाएँ ), 
बाएँ से अरुण भारती एवम अवतार एनगिल 
  यद्यपि मंच संचालन कर रहे तुलसी रमण ने उदघोषणा भी की कि यदि कोई बोलना चाहे तो बात कर सकता है,  लेकिन संकोच की ठंड से सभी के जिस्म कुर्सियों पर ही जमे रहे, इस तरह  कुछ लेखक कॉफी पीकर लौट गए और कुछ बिना कॉफी पीए तितर-बितर हो गए। इस आयोजन में अवतार की कविताओं ने गर्मी का माहौल बनाने में कसर नहीं छोड़ी, इसी से प्रभावित कुछ साहित्यिक मित्र संग्रह खरीदकर भी ले गए। अरुण भारती के कहानी संग्रह पर अलग से बात की जाएगी, अभी अवतार एनगिल के संग्रह पर बात-चीत करते हैं। 
                                           
                             अवतार एनगिल एक अर्से से कविता लिख रहे हैं और ‘बाघ की वापसी’ उनका छठा काव्य संग्रह है।  इस ताज़ा संग्रह में उनके  भीतर का कवि उन्हीं तेवरों में नज़र आता है, जिनमें कई बर्ष पहले था। अवतार एनगिल की दाढ़ी का रंग भले ही सफेद हो गया है, उनकी उम्र के हिसाब से लोग उन्हें बुज़ुर्ग कवि कह देते हों, लेकिन उनकी कविताएँ वैसी ही हैं,  हरी की हरी। 49 कविताओं के इस संग्रह में एक के बाद एक कविता ऐसी लय पैता करती है, कि पूरा संग्रह पढ़े बगैर रहा नहीं जाता। 

"सुबह की ओस में
निकल चला
अपने खोल से
एक परिंदा
और
चुटकी भर धूप ने
सहला दिए
उसके पंख।"

विमोचन समारोह में प्रतिभागी लेखक 
                                छोटी कविता का बड़ा जादू क्या होता है, यह इस कविता को पढ़ने के बाद बखूबी अहसास हो जाता है। बच्चे स्कूल किस तरह जाते हैं और घर किस तरह आते हैं इसे अवतार एनगिल ने कुछ ऐसे देखा:- 





“ नन्हें बच्चे
चलकर पहुँचते हैं स्कूल
मगर
छुट्टी होते ही
घर के लिए भागते हैं
आओ !
हम कोई ऐसा खेल रचें
कि बच्चे भागते हुए स्कूल आएँ
और चल कर घर जाएँ।" 


                                       जिस संघर्ष के बीचों-बीच अवतार एनगिल रहे हैं, वहीं से उन्होंने कविता भी की है। उनकी कविताएँ उनके जीवन का दर्शन भी कराती हैं। अवतार ने कविता में खुद को उसी रूप में रखा जिस रूप में वे पर्दे के पीछे दिखते हैं। उनकी कुछ पंक्तियाँ ऐसा अनुभव कराती हैं :-

" जाने कितनी बार
बसों रेल गाड़ियों में यात्रा करते
हम गंतव्य से आगे निकल गए
कितनी बार तेज़ वाहनों से बचते-बचाते
कुचले जाने से बच निकले हम...
.....जाने कितनी बार
बुरी तरह हारकर
कभी शानदार जीतकर
पिटकर या पीटकर
कभी लदे-फदे
कभी खाली हाथ
कभी खुश
कभी उदास
अपने इस द्वार तक
लौटे हम ।"

एक क्षण उनकी कविता एक लय पैदा करती है, तो दूसरे ही क्षण व्यंग्य बाण चला कर मूर्छित करती है

"महारात्रि उत्वस घर की
महानृत्य का पावन अवसर
नाच रहे थे सभी भक्त-जन
...मैं भी नाचा
नाचा ! नाचा ! नाचा ! नाचा !

हाथ पकड़कर उन संतों के
तभी जो देखा, अपने बायें
तभी जो देखा, अपने दायें
नाच रहे थे
नकटे.... नकटे....नकटे....नकटे !
बाबा की भी नाक नहीं थी !

तभी अचानक
देखा अपना हाथ उठाकर
तब यह जाना
                         मेरी अपनी नाक नदारद !
   

उनकी एक छोटी कविता कितनी खुलती है ज़रा देखिए:

" खण्डित पिंजरे में
कोई कंपन नहीं
जोगिया !
आ गए तुम !
चलें ?"
                                      
                                 उनकी कविताओं में तिब्बत के निर्वासन की पीड़ा भी है,और पशु-पक्षियों के दुःख़-दर्द को महसूस करने की संवेदना भी, उसी संवेदना से वो कविता का ऐसा जाल बुनते हैं कि उनके जाल में पाठक आकर फंस जाता है और फड़फड़ाता रहता है। पुराने दिनों को कवि आज भी नहीं भूल पाता और माँ से कुछ  इस तरह बात करता है:-

" मैं मां से बार-बार कहता
पास वाले वन में एक बाँसुरी
निरंतर बजा करती है
माँ कहती-
बाँसुरी नहीं, बजते हैं कान तेरे!"

                                   समय के साथ अवतार एनगिल ऐसी कड़ी बन चलते हैं, कि न पिछला कुछ भूलना चाहते हैं और न ही अगले को नकारते हैं। अपने आपको अपडेट करते हुए वो यूट्यूब पर भी घूम आते हैं, लेकिन चौरसिया की बाँसुरी उन्हें वहाँ भी नज़र आ जाती है। हिन्दी साहित्य ने इंटरनैट के प्रति जो उदासीनता अब तक दिखाई है, अवतार एनगिल उस पंक्ति के कवियों और साहित्यकारों में नहीं आते । उनकी ये पंक्तियाँ इस पर मुहर लगाती हैं:- 

" इन दिनों
धूप और छाया का विज्ञान
मुझे अक्लमंद बंना गया है
पास वाला वन
नहीं, अब कहीं
...
यू ट्यूब पर सुनता हूँ
चौरसिया की बाँसुरी ।" 

                                    पहाड़ों पर कम होती बर्फ और धूप के लिए तरसते घर, प्रवासी पक्षियों का आना-जाना,  अवतार की नज़र हर तरफ रहती है। फूल नदी, जल,  सभी को हम खो रहे हैं,  तो अवतार एनगिल उन्हें तलाश करते नज़र आते हैं। पहाड़ों में बहने वाली छोटी- बड़ी नदियों-नालों का पानी हमने किस तरह शहरों की ओर मोड़ दिया है और किस तरह बाँध बना नदियों को निगल दिया है, इस का चित्रण अवतार की कविताओं में नज़र आता है और इसके दुष्परिणामों को कैंसर रोग का बिंब देकर उनकी कविताएँ हमें आगाह किए बगैर भी नहीं रहतीं।
उनकी कविता की कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ हैं :


" जब आदमी नहीं माना
पानी नाराज़ हो गया
और.... खतरे के निशान से ऊपर बहने लगा
बहु-बेटियों की कोख़ में लगे गलने भ्रूण
ढौर-डांगर की चमड़ी लगी सड़ने
आदमी की छुअन से लगे रोगों से
जब पानी आया
धंस गया पीपल का पेड़ तिरछा होकर
इमामबाड़े की ईंटों में
बेघर हुए :

अल्हा रखा, भाई भगवान सिंह, पीटर पाल
पानी ने किसी खुदा का लिहाज़ नहीं किया ।"

                          अवतार एनगिल शिमला में रहे और और शिमला से उनका स्नेह उनकी कविता में साफ छलकता है । शिमला में स्कूल के दिनों से आज-तक को उन्होंने इस अन्दाज़ से पिरोया है, कि जो भी शिमला पर उनकी ये कविताएँ पढें, दीवाना हो जाए। उनकी नज़रों में शिमला एक जादुई शहर है, अगर यहाँ से किसी ने  भागना भी चाहा, तो देवदारुओं ने उसे अपनी बाहों में भीँच लिया, शिमला का बन्दर उन्हें पहली नज़र में अरस्तु लगता है, लेकिन हाथ से लिफाफा लपकते ही पता चलता है कि वह तो शिमला का बिग़ड़ैल बन्दर है । यहाँ अपने सपने सच करने आए बच्चे भी अवतार की नज़र से नहीं बचते और कवि को तब निराशा होती है, जब शिमला के घर द्वार इन बच्चों के लिए एक सपना ही बन कर रह जाते हैं ।
                                 इन बच्चों के बारे में बे कहते हैं कि :

"सपने तो लिए
उन्होंने पकड़
फिर भी
शिमला की छतें
घर-द्वार
उनके सपनों में बसे रहे।"

                             वहीं अवतार ने शिमला शहर को एक ऐसे जादुई शहर के रूप में देखा है, जहाँ बरसों पुराने मित्र अचानक आकर मिल जाते हैं। शिमला पर उनकी एक और कविता देखिए:

"थका हारा
बनवासी ईश्वर
यदि कहीं
कभी
लौटकर आएगा
तो इसी शहर के
किसी देवदार तले
पनाह पाएगा।"

                            इस कविता से अवतार एनगिल के कवि का एक और रूप झलकता है:

" हे दर्पण !
सभी कहते हैं
तुम झूठ नहीं बोलते
फिर भला
दायें को बायाँ
बायें को दायाँ
क्यों बताते हो ?" 

कविता पाठ करते अवतार एनगिल
संग्रह में दर्पण पर उनकी और कविताएँ भी ध्यान खीँचती हैं।

                चार खण्डों के इस कविता संग्रह का टाईटल खण्ड ‘बाघ की वापसी’ पढ़ने योग्य है। इस खण्ड को पढ़कर हाल ही में दिल्ली में हुए  गैंग रेप की वीभत्स तस्वीर तो सामने आती ही हैं, साथ ही साथ हमारी व्यवस्था पर भी बाघ के ज़रिये कवि ने व्यंग्य बाण छोड़े हैं। अवतार एनगिल की कविता का असली रंग इन कविताओं को पढ़कर ही चढता है। 
                         
                       बाघ पर उनकी ये पंक्तियाँ देखें:

" तीसरे पहर की प्रखर धूप में
कालेज से लौटती लड़की
बेहद त्रस्त है

उसे लगता है
उसका ‘भगवान जी’ भी
बाघों से डर गया है
जाने कहाँ प्रवास कर गया है

और...
सारा बाज़ार बाघों से भर गया है
सारा बाज़ार बाघों से भर गया है।"

                       उनकी बाघ पर एक और कविता की पंक्तियाँ कुछ इस 
 तरह है:

बाघ ने मेमने से कहा :
पह्ले मेरे अगले पंजे बांध दो
फिर मीडिया वालों को फोन लगाओ
आज, हम-तुम
संग-संग फोटो खिंचवाएँगे
सभी चैनलों वाले
उसे दिखाएँगे ।

                       ग़ज़ाला शीर्षक से प्रकाशित उनकी कविता तो मानो दिल्ली में हाल ही के दर्दनाक गैंगरेप का बखान करती हो,यद्यपि यह कविता घटना के कई दिनों पहले लिखी गई है। कविता कुछ यूँ है :

कल :
सुन्दरवन में
तीन शेरों ने
एक मृगी को धर-दबोचा
और सिंहनाद किया
आज :
राजधानी के राजपथ पर चलती ग़ज़ाला
आखिरी बार
उस लम्बी गाड़ी के निकट से निकलती देखी गई
पुलिस को
अभी तक
शेर सिंह, शेर खाँ और शैरी टाईगर की तलाश है।

                          अवतार एनगिल का कविता संग्रह पढ़ते- पढ़ते, शिमला की सर्द हवाएँ गर्म हो गईं, मैं किताब सिरहाने रख सोने लगा हूँ.... अरे... सुबह के तीन बज गए हैं.... ! 

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              'बाघ की वापसी' कविता संग्रह प्राप्त करने के लिए नीचे दी गई मेल पर संपर्क करें:

indirathakursml@gmail.com.

पुस्तक का मूल्य : हार्ड बाऊँड = 150 रुपये
                            पेपर बैक =   100 रुपये 

डाक खर्च 50 रुपये अतिरिक्त । 








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