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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

शिमला में 'बाघ की वापसी'

'बाघ की वापसी' का टाईटल पेज 
सात जनवरी 2013 को गेयटी थियेटर में फिर रंग भर गए। ये रंग कविता और कहानियों के रंग थे। मौका था, वरिष्ठ साहित्य्कार अवतार एनगिल के काव्य संग्रह ‘बाघ की वापसी’ और कहानीकार अरुण भारती के कहानी संग्रह ‘अच्छे लोग-बुरे लोग’ का विमोचन। ‘उत्स’ संस्था इस आयोजन में सारथी बनी और तुलसी रमण को आयोजक के रूप में देखा गया। भाषा विभाग के निदेशक, राकेश कंवर इस मौके पर मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे। उपस्थित कवि मण्डली में शिमला और इसके दुर्गम क्षेत्रों से आए साहित्यकार सभागार में विराजमान थे। विधिवत विमोचन हुआ और फिर अरुण भारती ने अपनी कहानी पढ़ी, इसके बाद अवतार एनगिल से भी कुछ कविताएँ पढ़वाई गईं। लेकिन बहुत से लेखक चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाए, कारण समय का अभाव बताया गया और आनन-फानन में आयोजन निपटा लिया गया।  अवतार एनगिल और अरुण भारती की कविताओं और कहानियों पर  लेखकों की ओर से कोई टिप्पणी नहीं आ सकीं।  बहुत से लेखकों के पर्चु शिमला के माईनस तापमान की ठंडी के बीच जेब से बाहर आने में कतराते रहे । 
विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि  भाषा विभाग के
 निदेशक राकेश कंवर, (बीच में)  'उत्स'  के अध्यक्ष तुलरी रमण(दाएँ ), 
बाएँ से अरुण भारती एवम अवतार एनगिल 
  यद्यपि मंच संचालन कर रहे तुलसी रमण ने उदघोषणा भी की कि यदि कोई बोलना चाहे तो बात कर सकता है,  लेकिन संकोच की ठंड से सभी के जिस्म कुर्सियों पर ही जमे रहे, इस तरह  कुछ लेखक कॉफी पीकर लौट गए और कुछ बिना कॉफी पीए तितर-बितर हो गए। इस आयोजन में अवतार की कविताओं ने गर्मी का माहौल बनाने में कसर नहीं छोड़ी, इसी से प्रभावित कुछ साहित्यिक मित्र संग्रह खरीदकर भी ले गए। अरुण भारती के कहानी संग्रह पर अलग से बात की जाएगी, अभी अवतार एनगिल के संग्रह पर बात-चीत करते हैं। 
                                           
                             अवतार एनगिल एक अर्से से कविता लिख रहे हैं और ‘बाघ की वापसी’ उनका छठा काव्य संग्रह है।  इस ताज़ा संग्रह में उनके  भीतर का कवि उन्हीं तेवरों में नज़र आता है, जिनमें कई बर्ष पहले था। अवतार एनगिल की दाढ़ी का रंग भले ही सफेद हो गया है, उनकी उम्र के हिसाब से लोग उन्हें बुज़ुर्ग कवि कह देते हों, लेकिन उनकी कविताएँ वैसी ही हैं,  हरी की हरी। 49 कविताओं के इस संग्रह में एक के बाद एक कविता ऐसी लय पैता करती है, कि पूरा संग्रह पढ़े बगैर रहा नहीं जाता। 

"सुबह की ओस में
निकल चला
अपने खोल से
एक परिंदा
और
चुटकी भर धूप ने
सहला दिए
उसके पंख।"

विमोचन समारोह में प्रतिभागी लेखक 
                                छोटी कविता का बड़ा जादू क्या होता है, यह इस कविता को पढ़ने के बाद बखूबी अहसास हो जाता है। बच्चे स्कूल किस तरह जाते हैं और घर किस तरह आते हैं इसे अवतार एनगिल ने कुछ ऐसे देखा:- 





“ नन्हें बच्चे
चलकर पहुँचते हैं स्कूल
मगर
छुट्टी होते ही
घर के लिए भागते हैं
आओ !
हम कोई ऐसा खेल रचें
कि बच्चे भागते हुए स्कूल आएँ
और चल कर घर जाएँ।" 


                                       जिस संघर्ष के बीचों-बीच अवतार एनगिल रहे हैं, वहीं से उन्होंने कविता भी की है। उनकी कविताएँ उनके जीवन का दर्शन भी कराती हैं। अवतार ने कविता में खुद को उसी रूप में रखा जिस रूप में वे पर्दे के पीछे दिखते हैं। उनकी कुछ पंक्तियाँ ऐसा अनुभव कराती हैं :-

" जाने कितनी बार
बसों रेल गाड़ियों में यात्रा करते
हम गंतव्य से आगे निकल गए
कितनी बार तेज़ वाहनों से बचते-बचाते
कुचले जाने से बच निकले हम...
.....जाने कितनी बार
बुरी तरह हारकर
कभी शानदार जीतकर
पिटकर या पीटकर
कभी लदे-फदे
कभी खाली हाथ
कभी खुश
कभी उदास
अपने इस द्वार तक
लौटे हम ।"

एक क्षण उनकी कविता एक लय पैदा करती है, तो दूसरे ही क्षण व्यंग्य बाण चला कर मूर्छित करती है

"महारात्रि उत्वस घर की
महानृत्य का पावन अवसर
नाच रहे थे सभी भक्त-जन
...मैं भी नाचा
नाचा ! नाचा ! नाचा ! नाचा !

हाथ पकड़कर उन संतों के
तभी जो देखा, अपने बायें
तभी जो देखा, अपने दायें
नाच रहे थे
नकटे.... नकटे....नकटे....नकटे !
बाबा की भी नाक नहीं थी !

तभी अचानक
देखा अपना हाथ उठाकर
तब यह जाना
                         मेरी अपनी नाक नदारद !
   

उनकी एक छोटी कविता कितनी खुलती है ज़रा देखिए:

" खण्डित पिंजरे में
कोई कंपन नहीं
जोगिया !
आ गए तुम !
चलें ?"
                                      
                                 उनकी कविताओं में तिब्बत के निर्वासन की पीड़ा भी है,और पशु-पक्षियों के दुःख़-दर्द को महसूस करने की संवेदना भी, उसी संवेदना से वो कविता का ऐसा जाल बुनते हैं कि उनके जाल में पाठक आकर फंस जाता है और फड़फड़ाता रहता है। पुराने दिनों को कवि आज भी नहीं भूल पाता और माँ से कुछ  इस तरह बात करता है:-

" मैं मां से बार-बार कहता
पास वाले वन में एक बाँसुरी
निरंतर बजा करती है
माँ कहती-
बाँसुरी नहीं, बजते हैं कान तेरे!"

                                   समय के साथ अवतार एनगिल ऐसी कड़ी बन चलते हैं, कि न पिछला कुछ भूलना चाहते हैं और न ही अगले को नकारते हैं। अपने आपको अपडेट करते हुए वो यूट्यूब पर भी घूम आते हैं, लेकिन चौरसिया की बाँसुरी उन्हें वहाँ भी नज़र आ जाती है। हिन्दी साहित्य ने इंटरनैट के प्रति जो उदासीनता अब तक दिखाई है, अवतार एनगिल उस पंक्ति के कवियों और साहित्यकारों में नहीं आते । उनकी ये पंक्तियाँ इस पर मुहर लगाती हैं:- 

" इन दिनों
धूप और छाया का विज्ञान
मुझे अक्लमंद बंना गया है
पास वाला वन
नहीं, अब कहीं
...
यू ट्यूब पर सुनता हूँ
चौरसिया की बाँसुरी ।" 

                                    पहाड़ों पर कम होती बर्फ और धूप के लिए तरसते घर, प्रवासी पक्षियों का आना-जाना,  अवतार की नज़र हर तरफ रहती है। फूल नदी, जल,  सभी को हम खो रहे हैं,  तो अवतार एनगिल उन्हें तलाश करते नज़र आते हैं। पहाड़ों में बहने वाली छोटी- बड़ी नदियों-नालों का पानी हमने किस तरह शहरों की ओर मोड़ दिया है और किस तरह बाँध बना नदियों को निगल दिया है, इस का चित्रण अवतार की कविताओं में नज़र आता है और इसके दुष्परिणामों को कैंसर रोग का बिंब देकर उनकी कविताएँ हमें आगाह किए बगैर भी नहीं रहतीं।
उनकी कविता की कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ हैं :


" जब आदमी नहीं माना
पानी नाराज़ हो गया
और.... खतरे के निशान से ऊपर बहने लगा
बहु-बेटियों की कोख़ में लगे गलने भ्रूण
ढौर-डांगर की चमड़ी लगी सड़ने
आदमी की छुअन से लगे रोगों से
जब पानी आया
धंस गया पीपल का पेड़ तिरछा होकर
इमामबाड़े की ईंटों में
बेघर हुए :

अल्हा रखा, भाई भगवान सिंह, पीटर पाल
पानी ने किसी खुदा का लिहाज़ नहीं किया ।"

                          अवतार एनगिल शिमला में रहे और और शिमला से उनका स्नेह उनकी कविता में साफ छलकता है । शिमला में स्कूल के दिनों से आज-तक को उन्होंने इस अन्दाज़ से पिरोया है, कि जो भी शिमला पर उनकी ये कविताएँ पढें, दीवाना हो जाए। उनकी नज़रों में शिमला एक जादुई शहर है, अगर यहाँ से किसी ने  भागना भी चाहा, तो देवदारुओं ने उसे अपनी बाहों में भीँच लिया, शिमला का बन्दर उन्हें पहली नज़र में अरस्तु लगता है, लेकिन हाथ से लिफाफा लपकते ही पता चलता है कि वह तो शिमला का बिग़ड़ैल बन्दर है । यहाँ अपने सपने सच करने आए बच्चे भी अवतार की नज़र से नहीं बचते और कवि को तब निराशा होती है, जब शिमला के घर द्वार इन बच्चों के लिए एक सपना ही बन कर रह जाते हैं ।
                                 इन बच्चों के बारे में बे कहते हैं कि :

"सपने तो लिए
उन्होंने पकड़
फिर भी
शिमला की छतें
घर-द्वार
उनके सपनों में बसे रहे।"

                             वहीं अवतार ने शिमला शहर को एक ऐसे जादुई शहर के रूप में देखा है, जहाँ बरसों पुराने मित्र अचानक आकर मिल जाते हैं। शिमला पर उनकी एक और कविता देखिए:

"थका हारा
बनवासी ईश्वर
यदि कहीं
कभी
लौटकर आएगा
तो इसी शहर के
किसी देवदार तले
पनाह पाएगा।"

                            इस कविता से अवतार एनगिल के कवि का एक और रूप झलकता है:

" हे दर्पण !
सभी कहते हैं
तुम झूठ नहीं बोलते
फिर भला
दायें को बायाँ
बायें को दायाँ
क्यों बताते हो ?" 

कविता पाठ करते अवतार एनगिल
संग्रह में दर्पण पर उनकी और कविताएँ भी ध्यान खीँचती हैं।

                चार खण्डों के इस कविता संग्रह का टाईटल खण्ड ‘बाघ की वापसी’ पढ़ने योग्य है। इस खण्ड को पढ़कर हाल ही में दिल्ली में हुए  गैंग रेप की वीभत्स तस्वीर तो सामने आती ही हैं, साथ ही साथ हमारी व्यवस्था पर भी बाघ के ज़रिये कवि ने व्यंग्य बाण छोड़े हैं। अवतार एनगिल की कविता का असली रंग इन कविताओं को पढ़कर ही चढता है। 
                         
                       बाघ पर उनकी ये पंक्तियाँ देखें:

" तीसरे पहर की प्रखर धूप में
कालेज से लौटती लड़की
बेहद त्रस्त है

उसे लगता है
उसका ‘भगवान जी’ भी
बाघों से डर गया है
जाने कहाँ प्रवास कर गया है

और...
सारा बाज़ार बाघों से भर गया है
सारा बाज़ार बाघों से भर गया है।"

                       उनकी बाघ पर एक और कविता की पंक्तियाँ कुछ इस 
 तरह है:

बाघ ने मेमने से कहा :
पह्ले मेरे अगले पंजे बांध दो
फिर मीडिया वालों को फोन लगाओ
आज, हम-तुम
संग-संग फोटो खिंचवाएँगे
सभी चैनलों वाले
उसे दिखाएँगे ।

                       ग़ज़ाला शीर्षक से प्रकाशित उनकी कविता तो मानो दिल्ली में हाल ही के दर्दनाक गैंगरेप का बखान करती हो,यद्यपि यह कविता घटना के कई दिनों पहले लिखी गई है। कविता कुछ यूँ है :

कल :
सुन्दरवन में
तीन शेरों ने
एक मृगी को धर-दबोचा
और सिंहनाद किया
आज :
राजधानी के राजपथ पर चलती ग़ज़ाला
आखिरी बार
उस लम्बी गाड़ी के निकट से निकलती देखी गई
पुलिस को
अभी तक
शेर सिंह, शेर खाँ और शैरी टाईगर की तलाश है।

                          अवतार एनगिल का कविता संग्रह पढ़ते- पढ़ते, शिमला की सर्द हवाएँ गर्म हो गईं, मैं किताब सिरहाने रख सोने लगा हूँ.... अरे... सुबह के तीन बज गए हैं.... ! 

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              'बाघ की वापसी' कविता संग्रह प्राप्त करने के लिए नीचे दी गई मेल पर संपर्क करें:

indirathakursml@gmail.com.

पुस्तक का मूल्य : हार्ड बाऊँड = 150 रुपये
                            पेपर बैक =   100 रुपये 

डाक खर्च 50 रुपये अतिरिक्त । 








रविवार, 10 मई 2009

शिमला पहुँची उड़नतश्तरी


सर्रर्रर्रर्रर्रर करती आई उड़नतश्तरी और दिल में उतर गई। समीर भाई के काव्य संग्रह "बिखरे मोती" ने मेरे दिल की कई तहों को खंगाला, कुरेदा, और मेरी स्मृतियाँ बरसों पुरानी दास्तानें कहने लगीं !
-प्रकाश बादल



"हैलो सर मैं कुरियर सर्विस से बोल रहा हूँ! आप कहाँ रहते हैं? आपका घर कहा पर है? आपका एक कुरियर आया है।" अचानक मेरे मोबाईल पर यह कॉल पाकर मैं डर गया, पिछले आठ महीनों से एक बैंक़ लोन की किश्त नहीं भरी थी तो सोचा कि उसी का नोटिस आ पहुँचा है। अपने शक की पुष्टि के लिए जब मैंने कुरियर वाले भाई साहब से पूछा कि कहाँ से आया है कुरियर? तो आवाज़ आई 'जबलपुर से सर!' मैं मन ही मन मुस्कुराया और खुशी से बोला अरे वाह!!!!!!!! उड़नतश्तरी.................. आखिर शिमला पहुँच ही गई और जब ये कुरियर मेरे हाथ लगा तो भाई समीर लाल का काव्य संग्रह "बिखरे मोती" मेरे हाथ में था। मैं समीर लाल जी से कभी व्यक्तिगत तौर से नहीं मिला हूँ, ब्लॉग जगत पर ही मुलाकात है उनसे! लेकिन उनकी तस्वीर मात्र देखकर उनके चेहरे से जो आत्मीयता झलकती है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि कोई अपने ही परिवार का सदस्य मिल गया है। समीर लाल जी से मिलने का सुकून पाना भी मेरे लिए सुखद आश्चर्य ही होगा। ख़ैर! छोड़िये, समीर भाई की तारीफ, जैसे मैं कर रहा हूँ, सब करते हैं, तो इसमें कोई नई बात भी नहीं! समीर भाई का व्यक्तित्व ही ऐसा है। आज मैं सिर्फ "बिखरे मोती" की बात करना चाहता हूँ।

समीर लाल जी का यह संग्रह ममता,पीड़ा, सुख दुःख,रिश्ते,नाते देश,परदेस,विरह,स्नेह आदि-आदि कई खट्टे-मीठे अनुभवों की ऐसी लड़ी है जो हमें कभी हँसाती है तो कभी भावनाओं के सागर में गोते लगते हैं और कभी देश-प्रेम के रंगों में मन डूब जाता है।
माँ का न होना मुझे आज फिर से अखरने लगा। गाँव के बरगद,पीपल याद आने लगे! दूर गए अपनों से मिलने को जी चाहा मन किया कि अभी सात-समंदर पार जाकर सभी को अपनी बाहों में भींच लूँ। मंदिर, मस्जिद ,गुरुद्वारों, चर्चों को एक पोटली में बाँधकर कहीं दूर रख आऊँ और हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी का माथा चूम लूँ, सब के साथ रहूँ एक ही जगह्। आतंकवादियों के लिए बददुआएँ दूँ, भ्रष्ट नेताओं को गोली से उड़ा दूँ। जी चाहा, अपनी माँ को वापस माँग लूँ खुदा से, ऐसी जादुई छड़ी तलाश करूँ जिससे गाँव के सभी बरगद,पीपल फिर से हरे हो जाएँ। सारे हिसाब-किताब भूल जाऊँ, बस सभी को अपनो के पास होने की कोई जुगत लगाऊँ। "बिखरे मोती" पढकर सभी के मन में ऐसी बैचेनी होना स्वभाविक ही है।


बिखरे मोती को पढ़ना शुरू किया तो माँ के आँचल की याद आई जब नंग-धड़ंग वह निश्छल बचपन सभी लाग-लपेट से दूर था, किसी भी विपदा में पड़ने पर माँ के आँचल का अश्रय मिल जाना, कितना सुखद था और फिर माँ का अचानक छोड़ जाना, मानो खुद को खूँखार चुनौतियों के बीच बचाए रखने के लिए तरह-तरह जतन करना ! कितना दूभर हो गया जीवन जब माँ न रही। इसी उधेड़बुन का निचोड़ ही तो है "बिखरे मोती"! इन्हीं तरह-तरह के अनुभवों के बिखरे मोतियों को ही तो भाई समीर लाल जी ने बखूबी पिरोया है।
माँ के आँचल के बिना धूप कितनी तेज़ हो जाती है और कितने ही दानव हमें लीलने को तैयार रहते है, "बिखरे मोती" इन्हीं अनुभवों से दो-चार कराता है। इसके साथ इसमें इस बात की चिंता भी है कि जाति,धर्म हमें किस प्रकार लड़ाने-भिड़ाने के जुग़ाड़ में लगे हैं। दाल-रोटी हमें न चाह कर भी तरह-तरह के नाच नचा रही है और हम वतन से दूर रहने पर विवश हैं। "बिखरे मोती" सिर्फ प्रेम- रस की कविताओं को लेकर ही नहीं है बल्कि इसमें दाल-रोटी,रिश्ते-नातों और मिट्टी से होकर ग़ुज़रने की सफल कोशिश भी शामिल है। "बिखरे मोती " में माँ की कमी समीर भाई कुछ इस प्रकार बयाँ करते हैं :

"
जब भी रातों में हवा कोई गीत गुनगुनाती है।
माँ मुझको तेरी बहुत याद आती है।"

उनकी दूसरी कविता में माँ के विरह की छटपटाहट कुछ इस तरह है :
" मेरी छत जाने कहाँ गई
माँ
तू जबसे दूजे जहाँ गई
ये घर बिन छत का लगता है।"

कविता लिखने के लिए किसी छंद की आवश्यकता से पहले संवेदना का होना प्रमुख है समीर भाई की कविता ऐसा भी कहती नज़र आती है। उनकी ये पँक्तियाँ देखिये:

"मुझको ज्ञान नहीं बिल्कुल छंदों का,

बस मन में अनुराग लिये फिरता हूँ मैं।"

विदेश में देश की याद तो सभी को आती है लेकिन समीर भाई ने इस दर्द को ऐसे साँचे में ढाल दिया है कि सभी भाव-विभोर हो जाते हैं। देखिए :
"जब पेड़ से कोयल कुहकेगी,
फिर फूल खिलेंगे आँगन में

जब मिट्टी में सोंधी ख़ुश्बू
मन झूल उठेंगे सावन में,

तब मतवाला होकर के मैं,

एक दुनिया नई सजाऊँगा
....जब होली और दीवाली पर
रौनक होगी बाज़ारों में...
...जब फिर से बदली छाएगी,
और मेघ गाए मल्हारों में...
जब मैं भी शामिल हो पाऊँगा

खुशियों के त्यौहारों में

तब गीत ख़ुशी के लिख दूँगा

और गाकर तुम्हें सुनाऊँगा।"

उनका यही दर्द इन पंक्तियों में किस तरह झलक रहा है गौर फरमाईये:

"सुना है आज होली है
हम बेवतन....

आज फिर
आँख अपनी हमने

आँसुओं से धो ली है।"

धर्म के नाम पर बंटे हम एक चिड़िया के समान ही तो हैं जिस धर्म में ढल गये उसी के हो जाते हैं ऐसा न जाने क्यों होता है उनकी चिड़िया कविता की ये पंक्तिया कुछ ऐसा ही कह रही हैं :

"चूँ चूँ करती,
ची चीं करती

जिसने पाली उसकी होती
उसी धर्म का बोझ ये ढोती।"

पाँच खण्डों में विभाजित समीर भाई के संग्रह का यह तो था पहला खण्ड दूसरे खण्ड में उनकी मुक्त छंद की कविताएँ ध्यान खींचती हैं दूसरे खण्ड में माँ का संदर्भ फिर आया और अबकी बार ये संदर्भ कई सवाल भी खड़े कर गया जरा मुलायज़ा फरमाईये:
"सुना है वो पेड़ कट गया
उसी शाम माई नहीं रही।"
...और सड़क पार माई की कोठरी
अब सुलभ शौचालय कहलाती है।"
विदेश में देश का विरह यहाँ भी झलकता है:
"कल शाम गया
वादा करके

अब आता होगा

अंशुमाली।"

समीर भाई ने एक और अहम प्रश्न ये भी उठाया है कि रचना अच्छी होने से बेहतर है कि आलोचक से जान-पहचान हो ऐसा न होने पर अच्छा कवि अच्छी कविताओं के ले बेशक सिर पीटता रहे। समीर भाई कहते हैं:


"कमी!
बहर की नहीं...

मात्राओं की भी नहीं...

छंद की भी नहीं....

काफिया भी ठीक रहा...

फिर क्या रह गया?

आलोचक से पूछ लेता,

मगर वो भी इस बार पहचान का नहीं।"

व्यंग्य की जो सटीक शैली होनी चाहिए वही तो समीर भाई के पास है तभी तो वे ऐसी पंक्तियाँ कितनी आसानी से और सलीके से कह देते हैं:

"मंहगाई बढ़ रही है
रोज़गार घट रहे हैं

किसान मर रहे हैं.....
...एक के बाद एक जादू कर रही सरकार
मगर फिर भी कहती है कि

उसके पास कोई जादुई डंडी नहीं।"

दिखावे की ज़िन्दगी जी रहे हम सभी को समीर भाई मानो अच्छी तरह पहचानते हों,तभी तो वे हम पर ऐसे सवाल दागते हैं, जिसका जवाब देते हम झेंप जाते हैं
"सोना उछलता है,
कपास लुढ़कती है!

भ्रष्टाचार तरल से तरलतम हो

फैलता जा रहा है

और मानावीय संवेदनाएं

जमी हुईं एकदम कठोर!
...क्या तुम्हारे पास खुशी का कारण है!
या मेरी तरह तुम भी ढोंगी हो

दिखावे भर को खुश!!!"

"मौत" शीर्षक से समीर जी की ये क्षणिका देखिए कितनी सटीक है:

"उस रात नींद में धीमे से आकर,
थामा जो उसने मेरा हाथ...

और हुआ एक अदभुत अहसास..

पहली बार नींद से जागने का...

मैं फिर कभी नहीं जागा।"

समीर लाल के लेखन पर क्या कहते हैं लेखक और साहित्यकार :
समीर लाल मूलत: प्रेम के कवि हैं वरिष्ठ साहित्यकार कुँअर बैचैन कहते हैं।







"अपने पर हंस कर जग को हंसाते हैं समीरलाल",सुपरिचित लेखकपंकज सुबीर कहते हैं।"







"बिखरे मोती"
के रूप मेंअपने मन की ग़ठरी समीरलाल ने क़ाग़ाज पर ख़ोलकर रख दी है : रमेश हठीला वरिष्ठ लेखक!






उधर वरिष्ठ लेखक
राकेश खंडेलवाल का कहना है "समीर लाल" की लेखनी अपने आप में अनोखी है।"


समीर भाई राजनीति को नया महाभारत की संज्ञा देकर कहते हैं के


"जनता
अपने ही चमत्कार से,

चमत्कारित होती

अपने ही चयन को

मुँह बाए,

आश्चर्य से देखती!
...लोकतांत्रिक तरीके से,
लोकतंत्र का चीरहरण!"

समीर भाई की ये पंक्तियाँ भी काबिले ग़ौर हैं:

"दूर देश की यादों में,
जाने कब

खो जाता है वो!

जाने कब,

सो जाता है वो!"

उनके कुछ चित्र इस तरह भी हैं:
"साहिल पर बैठा
वो जो डूबने से बचने की,

सलाह देता है

उसे तैरना नहीं आता

वरना

बच सकता था।
*****
वो हंस कर

बस यह

अहसास दिलाता हैं

वो ज़िन्दा है अभी।"

अगर आपको दुनिया रंग-बिरंगी लगती है तो फिर समीर भाई की ये पंक्तियाँ पढ़ लीजिए आपको अपनी ग़लतफहमी का शायद अहसास हो जाए:
"सबके देखने के,
अपने-अपने ढंग़ है,

बाकि सब

हमारे चश्मों के रंग हैं।"

तीसरे खण्ड में समीर भाई क़ी ग़ज़लें भी मन को छू जाती हैं। ज़ाहिर है इसमें शुरूआत शबाब से होती है, कुछ इस तरह:

"दम सीने में फंसा हुआ कमवख़्त निकले,
तिरछा सा वार बाकी है,इक तेरी नज़र का।"

और फिर समीर जी भला प्यार के ही रंगों में कब तक डूबे रहते? ज़रा ये लाईनें देखिये:

"देखता हूँ बैठकर मैं इस चिता पर कब्रगाह,
छोड़ दो इस बात को,ये मज़हबी हो जाएगी?"

"धर्म का ले नाम चलती है यहाँ पर जो हवा,
पेड़ उसमें एक मैं जड़ से उखड़ता रह गया।"

इसके अतिरिक्त समीर लाल जी ने मुक्तक और क्षणिकाओं में भी प्यार के साथ-साथ दाल-रोटी,तीज-त्यौहार,और दहेज जैसे ज्वलंत मसले अपने ही रंग में उठाए हैं, इसी कारण उनका यह संग्रह पठनीय बन पड़ा है। भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार कुँअर बेचैन ने बाँधी है और सुपरिचित लेखक पंकज सुबीर ने भी 'बिखरे मोती' की लेखनी को सराहा है।
लेखक राकेश खंडेलवाल जी ने समीर भाई को अनोखी लेखनी का मालिक कहा है, सिहोर के शिवना प्रकाशन ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया है।पुस्तक की छपाई भी आकर्षक है। समीर भाई ने यह पुस्तक अपनी माता जी स्वर्गीय श्रीमति सुषमा लाल को समर्पित किया है। पुस्तक हर तरह से आकर्षित करती है। पुस्तक का डिज़ाईन संजय बैंगणी और पंकज बैंग़णी ने बनाया है जो बहुत ही आकर्षक बन पड़ा है। बैंग़णी बंधुओं को भला कौन नहीं जानता। इस प्रकार समीर भाई का यह संग्रह हर तरह से आकर्षित करता है और सभी के मन को छू जाता है क्योंके समीर भाई सभी के दिलों में रहते हैं और हर दिल अजीज़ है! तभी तो कहते हैं समीर भाई की उड़नतश्तरी टोरंटो से शिमला तक सर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र !!!!!!!!!



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पुस्तक का मूल्य 200 रुपये है डाक खर्च अतिरिक्त।










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