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गुरुवार, 1 सितंबर 2011

ये कैसी घृणा की नदी तेरे मेरे बीच

असिक्नी पत्रिका में प्रकाशित गज़ल भाई मनु, अरुण डोगरा और अर्श भाई के लिए थी, मित्र का कोई और ही अर्थ न निकाल लिया जाए इस लिए सूरत साफ कर दी जाए तो अच्छा।



ये कैसी घृणा की नदी तेरे मेरे बीच,
है एक पुल की कमी तेरे मेरे बीच।


तूने ही पटरियाँ बराबर न की,
थी प्यार की तो रेल चली तेरे मेरे बीच।


न मुझे सोने दिया, खुद भी जग रहा,
कुछ यूँ रातें कटीं तेरे मेरे बीच,


सूरज को कब रोक पाईं सरहदें,
है बराबर सी धूप बँटी तेरे मेरे बीच

बुधवार, 25 अगस्त 2010

उसका चेहरा



नज़्म,कविता,शेर, ग़ज़ल उसका चेहरा।
लहलहाती एक फसल उसका चेहरा।


वो मुझको  तो अपना सा ही लगता है,
चाहे असल हो या नकल उसका चेहरा।


हर दिल को मुमताज़ कर दे पल भर में,
शहाजहाँ का  ताजमहल  उसका चेहरा।


घड़ी भर को ही तो हम ठहरे थे,

समय जैसे गया निकल उसका चेहरा।
 

दरिया में  कंकर जैसे कोई मार गया,
गौर से देखो ऐसी हलचल उसका चेहरा।
 

मंहगाई में ग़रीबों से सब धंसते जाएं,
नहीं है वैसा, पर है दलदल उसका चेहरा,
 

फुटपाथ पर कई रोज़ के भूखे सा मैं,
इसी भूख में आटा- चावल उसका चेहरा।
 

पल भर में है रविवार की छुट्टी सा और,
पल में होता सोम-मंगल उसका चेहरा।
 

मंहगाई भत्तों की आस में बाबू से सब,
सियासी झाँसे सा चपल उसका चेहरा।
 

रस्ता भूलूँ उसमें, या फिर लुट जाऊँ मैं,
मुझको लगता है इक चंबल उसका चेहरा।

मंगलवार, 17 मार्च 2009

...बहरे आवाज़ों के बीच।

स्कूल डायरी से एक और ग़ज़ल आपकी नज़र कर रहा हूँ:



कई रोज़ हो बेशक ठहरे आवाज़ों के बीच।

क्या माने रखते हैं बहरे आवाज़ों के बीच॥


चुपके से वो सन्नाटों में ज़हर घोल कर चले गये,

आप दे रहे हैं पहरे आवाज़ों के बीच।


अपनी शरारतों पर हम सूरज को कोस रहे,

बेमौसम क्यों जलीं दोपहरें आवाज़ों के बीच।


बारूद और बर्बादी से आगे ही हैं फैल रहे,

नफरत के जो भाव हैं गहरे आवाज़ों के बीच।


जो कटता है कट जाने दे जो घटता है घट जाने दे,

जीना है तो कुछ मत कह रे आवाज़ो के बीच।

रविवार, 8 मार्च 2009

....चोंच में घर.....

आज अचानक एक डायरी हाथ लगी, जो उस समय की थी जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उस डायरी में कई रचनाएं मिली जिनमेंसे अधिकतर खारिज कर दी लेकिन कुछ मुझे अच्छी लगीं उनमें से एक रचना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ आपकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा रहेगी: (प्रकाश बादल)


कटे हुए पर लिए घूमती है।

हवाएं खंजर लिए घूमती है।


जिस ज़िन्दगी का तुम्हें भरोसा है,

मौत हथेली पर लिए घूमती है।


दरअसल है बुराई उसी की रगों में,

जो दुनिया तीन बंदर लिए घूमती है।


आपकी नज़र में होगा तिनका वो,

चिड़िया चोंच में घर लिए घूमती है।


फिर धुंध ने किया पहाड़ियों का अपहरण,

झुग्गियाँ बाढ़ का डर लिए घूमती हैं।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

अब इस कदर भी उजाले न हो---

इस कदर भी उजाले न हो।

घर आग के निवाले न हो।


प्यासे हलक से गुज़रे न जब तलक,

नदी समन्दर के हवाले न हो।


बोल प्यार के हों ग़ज़ल की राह में,

मस्जिद
न हो और शिवाले न हो।


सूरज अबके ऐसी भी धूप न बाँटे,

कि पहाड़ पर बर्फ़ के दुशाले न हो।


खुशियों की मकड़ियों का वहाँ गुज़र नहीं,

ग़मों के जिस घर में जाले न हो।


इस हमाम में सब नंगे नज़र आएंगे।

सच की ज़बान पर जो ताले न हो।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

बोलता नहीं लेकिन...

बोलता नहीं लेकिन बड़बड़ाता तो है।

सच होंठ पर लेकिन आता तो है।


अर्श शौक से अब ओले उड़ेल दे,

मूंडे गए सरों के पास छाता तो है।


तेरी मंज़िल मिले न मिले क्या पता,

है तय ये रस्ता कहीं जाता तो है।


फिज़ाओं में यूँ ही नहीं है हलचल,

तीर चुपके से कोई चलाता तो है।


दुश्मन व्यवस्था को टुकड़े न समझें,

दिशाओं का आपस में नाता तो है।


खुद ही चप्पु न चलाओ तो क्या बने,

वक्त कश्ती में तुम्हें बिठाता तो है।


कोई भी संवरने को यहां नहीं राज़ी,

वक्त सब को आईना दिखाता तो है।


हमारी जिद कि हम तमाशा न हुए,

हँसना ज़माने को वरना आता तो है।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

चिकने चेहरे इतने भी........

चिकने चेहरे इतने भी सरल नहीं होते।
ये वो मसले हैं जो आसानी से हल नहीं होते।

कुछ ही पलों की चमक और खुशबू इनकी,
ये फूल किसी का कभी संबल नहीं होते।

भूखों में बाँट दीजिए जो बचा रखा है,
जीवन के हिस्से में कभी कल नहीं होते।

शायर वो क्या, क्या उनकी शायरी,
जो ख़ुद झूमती हुई ग़ज़ल नहीं होते।

कोख़ माँ की किसी को न जब तलक मिले,
बीज कैसे भी हों, फ़सल नहीं होते।

विवशताओं ने पागल कर दिया होगा,
ख़्याल बचपने से कभी चँबल नहीं होते।

जम गई होगी वक्त की धूल वरना,
आईने की प्रकृति में छल नहीं होते।

(दिल्ली में मेरा एक छोटा भाई रहता है "
अमित के साग़र "ये ग़ज़ल उसी को समर्पित है।)

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

सच के लिबास में......

सच के लिबास में दिखाई देना।

और पेशा है झूठी सफाई देना।


यूं चीखने से बात नहीं बनती,

मायने रखता है सुनाई देना।


लाद गया वो किताबों के भारी बस्ते,

मैने कहा था बच्चों को पढ़ाई देना।


जो दर्द दिए तूने उसका हिसाब कर,

फिर मुझे नए साल की बधाई देना।


कितना अच्छा है पत्त्थर पूजने से,

बीमार ग़रीबों को दवाई देना।


परिंदो का पिजरे में लौट आना है अलग,

अलग बात है उन्हें पिंजरे से रिहाई देना।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

पैमाना न दरमियान रख....

 पैमाना न दरमियान रख।

 मेरे ख़्यालों में उड़ान रख।


दिल से दिल का फासला न हो,

 इस सलीके से गीता और कुरान रख।


बहुत हुई महलों की फिक्र, छोड़ दे,

बेघरों के हिस्से में अब मकान रख।


बस्तियां रौंद लेगी ये नदी रोकी हुई,

ज़रूरत से ज़्यादा न तू अपना विज्ञान रख।


अश्ललीलता को जो तालीम मान बैठै हैं,

उन बच्चों के ज़हन में बड़ों को सम्मान रख।


तिलमिला उठा वो मेरी इस गुज़ारिश पर,

कि मेरे होठों पर भी थोड़ी मुस्कान रख।

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

ऐसा नहीं कि ज़िन्दा जंगल नहीं है....


ऐसा नहीं के ज़िंदा जंगल नहीं है।
गांव के नसीब बस पीपल नहीं है।


ये आंदोलन नेताओं के पास हैं गिरवी,
दाल रोटी के मसलों का इनमें हल नहीं है।


चील, गिद्ध, कव्वे भी अब गीत गाते हैं,
मैं भी हूं शोक में, अकेली कोयल नहीं है।


ज़रूरी नहीं के मकसद हो उसका हरियाली,
विश्वासपात्रों में मानसून का बादल नहीं है।


उसके सीने से गुज़री तो आह निकल गई,
जो मेरी ग़ज़ल को कहता रहा,ग़ज़ल नहीं है।


जिनका पसीना उगलता है बिजलियां,
रौशनी का नसीब उन्हें आंचल नहीं है।

ऐसा नहीं कि ज़िन्दा.............

ऐसा नहीं के ज़िंदा जंगल नहीं है।

गांव के नसीब बस पीपल नहीं है।


ये आंदोलन नेताओं के पास हैं गिरवी,

दाल रोटी के मसलों का इनमें हल नहीं है।


चील, गिद्ध, कव्वे भी अब गीत गाते हैं,

मैं भी हूं शोक में, अकेली कोयल नहीं है।


ज़रूरी नहीं के मकसद हो उसका हरियाली,

विश्वासपात्रों में मानसून का बादल नहीं है।


उसके सीने से गुज़री तो आह निकल गई,

जो मेरी ग़ज़ल को कहता रहा,ग़ज़ल नहीं है।


जिनका पसीना उगलता है बिजलियां,

रौशनी का उन्हें आंचल नहीं है।

शनिवार, 29 नवंबर 2008

मत पूछो क्या है हाल............

(मुम्बई में हुए आतंकी हमले से

आहत हूं और ईश्वर से प्रार्थना

करता हूं कि आतंक फैलाने

वाले लोगों को खुदा राह दिखाए)


मत पूछो क्या है हाल शहर में।
ज़िन्दगी हुई है बवाल शहर में।

कुछ लोग तो हैं बिल्कुल लुटे हुए,
कुछ हैं माला-माल शहर में।

झुलसी लाशों की बू हर तरफ,
कौन रखे नाक पर रूमाल शहर में।

चोर,लुटेरे, डाकू और आतंकवादी,
सब नेताओं के दलाल शहर में।

भौंकते इंसानों को देखकर,
की कुत्तों ने हड़ताल शहर में।

मुहब्बत के मकां ढहने लगे,
मज़हब का आया भूंचाल शहर में।

बिना घूंस के मिले नौकरी,
ये उठता ही नहीं सवाल शहर में।

रविवार, 23 नवंबर 2008

आदमी जैसे ही कुछ.......

आदमी जैसे ही कुछ अजगरों के बीच।
चंदन सी ज़िंदगी है विषधरों के बीच।

ये,वो,,मैं, तू हैं सब तमाशबीन,
लहूलुहान सिसकियां हैं खंजरों के बीच।

शहर के मज़हब से नवाकिफ़ अंजान वो,
बातें प्यार की करे कुछ सरफिरों के बीच।

भरी सभा में द्रौपदी सा चीख़े मेरा देश,
कब आओगे कृष्ण इन कायरों के बीच।

ख़ुद ही अब बताएंगे के हम ख़ुदा नहीं,
आज गुफ़्तगू हुई ये पत्थरों के बीच।

आंसू इसलिये आंख से छलकाता नहीं मैं,
कुछ मछलियां भी रहतीं हैं सागरों की बीच।

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

भोर का वहम पाले.........

भोर का वहम पाले उनको ज़माना हुआ।
कब सुनहरी धूप का गुफाओं में जाना हुआ।

रख उम्मीद कोई दिया तो जलेगा कभी,
भूख के साथ पैदा हमेशा ही दाना हुआ।

मर्यादा में था तो सुरों में न ढल सका,
शब्दों को नंगा किया तो ये गाना हुआ।

तरकश उनका तीरों से हो गया ख़ाली मगर,
मेरे हौसले ने अभी भी है सीना ताना हुआ।

हो आपको ही मुबारक ये मख़मली अहसास,
जो चुभता ही नहीं वो भी क्या सिरहाना हुआ।

थोड़ी सी नींद जब चिंताओं से मांगी उधार,
लो सज-धज के कमवख़्त का भी आना हुआ।

जिसमें दिल की धड़कन ही न शामिल हुई,
वो भला क्या हाथों में मेंहदी लगाना हुआ।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

गज़ल 14/11/2008

जब-जब मैं सच कहता हूं।
सब को लगता कड़वा हूं।

वो मेरी टांग की ताक में है,
कि कब मैं ऊपर उठता हूं।

जो भी नोक पर आते हैं,
बस उनको ही चुभता हूं।

उम्र में जमा सा बढ़ता हूं,
जीवन से नफी सा घटता हूं।

तू जो मुझ पर मरती है,
इसीलिये तो जीता हूं।

वो नाखून दिखाने लगते हैं,
घावों की बात जो कहता हूं।
तूफान खड़ा हो जाता है,
जब तिनका-तिनका जुड़ता हूं।

बुधवार, 12 नवंबर 2008

जब हों जेबें खाली.......


जब हों जेबें खाली साहब।
फिर क्या ईद दीवाली साहब।

तिनका - तिनका जिसने जोड़ा,
वो चिडिया डाली-डाली साहब।

सब करतब मजबूरी निकलेँगे,
जो बंदर से आंख मिला ली साहब।

कंक्रीटी भाषा बेशक सबकी हो,
पर अपनी तो हरियाली साहब।


मौसम ने सब रंग धो दिये,
सारी भेडें काली साहब।

आधार की बातें, सब किस्से उसके,
दो बैंगन को थाली साहब।

जब अच्छे से जांचा - परखा,
सारे रिश्ते जाली साहब।


(इस गज़ल को दोबारा इस लिये पोस्ट कर रहा हूं क्योंके एक काबिले गौर शेर इससे छूट गया था, पठकों की बेबाक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी )

सोमवार, 10 नवंबर 2008

जब से तेरे प्यार में.......


जब से तेरे प्यार में पागल रहा हूं मैं।
शहर भर की तबसे हलचल रहा हूं मैं।

मेरी भाषा अब ये समंदर क्या जाने,
कि नदी में बहती हुई कल-कल रहा हूं मैं,

बर्फ हूं मेरे नाम से ठिठुरते हैं सभी,
पहाडों पर लेकिन बिछा कंबल रहा हूं मैं।

आग आरियां,तूफान, बारिश, साजिशें बौनी हुई,
लहलहाता हुआ मगर जंगल रहा हूं मैं।

होकर माला-माल शून्य कई लौट गए,
भूल गये कि उनका एक हासिल रहा हूं मैं।
डाकू तो रह रहे सब संसद की शरण में,
बस नाका ही अब चंबल रहा हूं मैं।

सच ढूँढता रहा.....

सच ढूंढ्ता रहा शहादत देखिये।
झूठ की हो भी गई ज़मानत देखिये।

अब मौत के आसार हैं ज़्यादा क्योंकि
कड़ी कर दी गई है हिफ़ाज़त देखिए।

भ्रष्टाचार का जंगल तैयार क्यों न हो,
वृक्षारोपण कर रही है सिसायत देखिये।

घरों को बौना रखने के आदेश जो दे गये है‍,
गगनचुम्बी उनकी आप ईमारत देखिये।

विज्ञापनों के खूंटे में टंगा अखबार,
क्या लिखेगा सच की इबारत देखिये।

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

इरादे जिस दिन से...........

इरादे जिस दिन से उड़ान पर हैं।
हजारों तीर देखिये कमान पर हैं।

लोग दे रहे हैं कानों में उँगलियाँ,
ये कैसे शब्द आपकी जुबां पर है।

मेरा सीना अब करेगा खंजरों से बगावत,
कुछ भरोसा सा इसके बयान पर हैं।

मजदूरों के तालू पर कल फिर दनदनाएगा,
सूरज जो आज शाम की ढलान पर है।

झुग्गियों की बेबसी तक भी क्या पहुंचेगी,
ये बहस जो गीता और कुरान पर है।

मजदूर,मवेशी, मछुआरे फिर मरे जाएंगे,
सावन देखिये आगया मचान पर है,

मक्कारों और चापलूसों से दो चार कैसे होगा,
तेरे पैर तो अभी से थकान पर है ।



शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008

प्रकाश बादल की दो नई गज़लें


ग़ज़ल
ये बजट आपका हमको तो गवारा नहीं।
चिड़ियों को घोंसले जिसमें पशुओं को चारा नहीं।

यूँ ही माथा गर्म नहीं, है ये दिमागी बुखार,
पिघलते ग्लेशियरों का समझते क्यों इशारा नहीं।

मंगल और वीर को वो शाकाहारी वेष्णो,
जिस्म नोच कर खाते हैं पर वक़्त सारा नहीं।

औहदे और दाम तो हमको भी थे मिल रहे,
संस्कारों का लिबास मगर हमीं ने ही उतरा नहीं।

महलों से निकलकर झुग्गियों में फ़ैल गई,
गमलों की ज़िन्दगी में खुशबु का गुज़ारा नहीं।

जाने अब तक कितने तूफान पी गया है,
इस समंदर का पानी यूँ ही तो खारा नहीं,

दो रोटियों का वो चुटकी में हल करता है सवाल,
ये पत्थर का खुदा तो मगर हमारा नहीं।


ग़ज़ल
इरादे जिस दिन से उड़ान पर हैं।
हजारों तीर देखिये कमान पर हैं।

लोग दे रहे हैं कानों में उँगलियाँ,
ये कैसे शब्द आपकी जुबां पर है।

मेरा सीना अब करेगा खंजरों से बगावत,
कुछ भरोसा सा इसके बयान पर है।

मजदूरों के तालू पर कल फिर दनदनाएगा,
सूरज जो आज शाम की ढलान पर है।

झुग्गियों की बेबसी तक भी क्या पहुँचेगी,
ये बहस जो गीता और कुरान पर है।

मजदूर,मवेशी, मछुआरे फिर मरे जाएंगे,
सावन देखिये आगया मचान पर है,

मक्कारों और चापलूसों से दो चार कैसे होगा,
तेरे पैर तो अभी से थकान पर है ।



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