मंगलवार, 8 जनवरी 2013

शिमला में 'बाघ की वापसी'

'बाघ की वापसी' का टाईटल पेज 
सात जनवरी 2013 को गेयटी थियेटर में फिर रंग भर गए। ये रंग कविता और कहानियों के रंग थे। मौका था, वरिष्ठ साहित्य्कार अवतार एनगिल के काव्य संग्रह ‘बाघ की वापसी’ और कहानीकार अरुण भारती के कहानी संग्रह ‘अच्छे लोग-बुरे लोग’ का विमोचन। ‘उत्स’ संस्था इस आयोजन में सारथी बनी और तुलसी रमण को आयोजक के रूप में देखा गया। भाषा विभाग के निदेशक, राकेश कंवर इस मौके पर मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे। उपस्थित कवि मण्डली में शिमला और इसके दुर्गम क्षेत्रों से आए साहित्यकार सभागार में विराजमान थे। विधिवत विमोचन हुआ और फिर अरुण भारती ने अपनी कहानी पढ़ी, इसके बाद अवतार एनगिल से भी कुछ कविताएँ पढ़वाई गईं। लेकिन बहुत से लेखक चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाए, कारण समय का अभाव बताया गया और आनन-फानन में आयोजन निपटा लिया गया।  अवतार एनगिल और अरुण भारती की कविताओं और कहानियों पर  लेखकों की ओर से कोई टिप्पणी नहीं आ सकीं।  बहुत से लेखकों के पर्चु शिमला के माईनस तापमान की ठंडी के बीच जेब से बाहर आने में कतराते रहे । 
विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि  भाषा विभाग के
 निदेशक राकेश कंवर, (बीच में)  'उत्स'  के अध्यक्ष तुलरी रमण(दाएँ ), 
बाएँ से अरुण भारती एवम अवतार एनगिल 
  यद्यपि मंच संचालन कर रहे तुलसी रमण ने उदघोषणा भी की कि यदि कोई बोलना चाहे तो बात कर सकता है,  लेकिन संकोच की ठंड से सभी के जिस्म कुर्सियों पर ही जमे रहे, इस तरह  कुछ लेखक कॉफी पीकर लौट गए और कुछ बिना कॉफी पीए तितर-बितर हो गए। इस आयोजन में अवतार की कविताओं ने गर्मी का माहौल बनाने में कसर नहीं छोड़ी, इसी से प्रभावित कुछ साहित्यिक मित्र संग्रह खरीदकर भी ले गए। अरुण भारती के कहानी संग्रह पर अलग से बात की जाएगी, अभी अवतार एनगिल के संग्रह पर बात-चीत करते हैं। 
                                           
                             अवतार एनगिल एक अर्से से कविता लिख रहे हैं और ‘बाघ की वापसी’ उनका छठा काव्य संग्रह है।  इस ताज़ा संग्रह में उनके  भीतर का कवि उन्हीं तेवरों में नज़र आता है, जिनमें कई बर्ष पहले था। अवतार एनगिल की दाढ़ी का रंग भले ही सफेद हो गया है, उनकी उम्र के हिसाब से लोग उन्हें बुज़ुर्ग कवि कह देते हों, लेकिन उनकी कविताएँ वैसी ही हैं,  हरी की हरी। 49 कविताओं के इस संग्रह में एक के बाद एक कविता ऐसी लय पैता करती है, कि पूरा संग्रह पढ़े बगैर रहा नहीं जाता। 

"सुबह की ओस में
निकल चला
अपने खोल से
एक परिंदा
और
चुटकी भर धूप ने
सहला दिए
उसके पंख।"

विमोचन समारोह में प्रतिभागी लेखक 
                                छोटी कविता का बड़ा जादू क्या होता है, यह इस कविता को पढ़ने के बाद बखूबी अहसास हो जाता है। बच्चे स्कूल किस तरह जाते हैं और घर किस तरह आते हैं इसे अवतार एनगिल ने कुछ ऐसे देखा:- 





“ नन्हें बच्चे
चलकर पहुँचते हैं स्कूल
मगर
छुट्टी होते ही
घर के लिए भागते हैं
आओ !
हम कोई ऐसा खेल रचें
कि बच्चे भागते हुए स्कूल आएँ
और चल कर घर जाएँ।" 


                                       जिस संघर्ष के बीचों-बीच अवतार एनगिल रहे हैं, वहीं से उन्होंने कविता भी की है। उनकी कविताएँ उनके जीवन का दर्शन भी कराती हैं। अवतार ने कविता में खुद को उसी रूप में रखा जिस रूप में वे पर्दे के पीछे दिखते हैं। उनकी कुछ पंक्तियाँ ऐसा अनुभव कराती हैं :-

" जाने कितनी बार
बसों रेल गाड़ियों में यात्रा करते
हम गंतव्य से आगे निकल गए
कितनी बार तेज़ वाहनों से बचते-बचाते
कुचले जाने से बच निकले हम...
.....जाने कितनी बार
बुरी तरह हारकर
कभी शानदार जीतकर
पिटकर या पीटकर
कभी लदे-फदे
कभी खाली हाथ
कभी खुश
कभी उदास
अपने इस द्वार तक
लौटे हम ।"

एक क्षण उनकी कविता एक लय पैदा करती है, तो दूसरे ही क्षण व्यंग्य बाण चला कर मूर्छित करती है

"महारात्रि उत्वस घर की
महानृत्य का पावन अवसर
नाच रहे थे सभी भक्त-जन
...मैं भी नाचा
नाचा ! नाचा ! नाचा ! नाचा !

हाथ पकड़कर उन संतों के
तभी जो देखा, अपने बायें
तभी जो देखा, अपने दायें
नाच रहे थे
नकटे.... नकटे....नकटे....नकटे !
बाबा की भी नाक नहीं थी !

तभी अचानक
देखा अपना हाथ उठाकर
तब यह जाना
                         मेरी अपनी नाक नदारद !
   

उनकी एक छोटी कविता कितनी खुलती है ज़रा देखिए:

" खण्डित पिंजरे में
कोई कंपन नहीं
जोगिया !
आ गए तुम !
चलें ?"
                                      
                                 उनकी कविताओं में तिब्बत के निर्वासन की पीड़ा भी है,और पशु-पक्षियों के दुःख़-दर्द को महसूस करने की संवेदना भी, उसी संवेदना से वो कविता का ऐसा जाल बुनते हैं कि उनके जाल में पाठक आकर फंस जाता है और फड़फड़ाता रहता है। पुराने दिनों को कवि आज भी नहीं भूल पाता और माँ से कुछ  इस तरह बात करता है:-

" मैं मां से बार-बार कहता
पास वाले वन में एक बाँसुरी
निरंतर बजा करती है
माँ कहती-
बाँसुरी नहीं, बजते हैं कान तेरे!"

                                   समय के साथ अवतार एनगिल ऐसी कड़ी बन चलते हैं, कि न पिछला कुछ भूलना चाहते हैं और न ही अगले को नकारते हैं। अपने आपको अपडेट करते हुए वो यूट्यूब पर भी घूम आते हैं, लेकिन चौरसिया की बाँसुरी उन्हें वहाँ भी नज़र आ जाती है। हिन्दी साहित्य ने इंटरनैट के प्रति जो उदासीनता अब तक दिखाई है, अवतार एनगिल उस पंक्ति के कवियों और साहित्यकारों में नहीं आते । उनकी ये पंक्तियाँ इस पर मुहर लगाती हैं:- 

" इन दिनों
धूप और छाया का विज्ञान
मुझे अक्लमंद बंना गया है
पास वाला वन
नहीं, अब कहीं
...
यू ट्यूब पर सुनता हूँ
चौरसिया की बाँसुरी ।" 

                                    पहाड़ों पर कम होती बर्फ और धूप के लिए तरसते घर, प्रवासी पक्षियों का आना-जाना,  अवतार की नज़र हर तरफ रहती है। फूल नदी, जल,  सभी को हम खो रहे हैं,  तो अवतार एनगिल उन्हें तलाश करते नज़र आते हैं। पहाड़ों में बहने वाली छोटी- बड़ी नदियों-नालों का पानी हमने किस तरह शहरों की ओर मोड़ दिया है और किस तरह बाँध बना नदियों को निगल दिया है, इस का चित्रण अवतार की कविताओं में नज़र आता है और इसके दुष्परिणामों को कैंसर रोग का बिंब देकर उनकी कविताएँ हमें आगाह किए बगैर भी नहीं रहतीं।
उनकी कविता की कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ हैं :


" जब आदमी नहीं माना
पानी नाराज़ हो गया
और.... खतरे के निशान से ऊपर बहने लगा
बहु-बेटियों की कोख़ में लगे गलने भ्रूण
ढौर-डांगर की चमड़ी लगी सड़ने
आदमी की छुअन से लगे रोगों से
जब पानी आया
धंस गया पीपल का पेड़ तिरछा होकर
इमामबाड़े की ईंटों में
बेघर हुए :

अल्हा रखा, भाई भगवान सिंह, पीटर पाल
पानी ने किसी खुदा का लिहाज़ नहीं किया ।"

                          अवतार एनगिल शिमला में रहे और और शिमला से उनका स्नेह उनकी कविता में साफ छलकता है । शिमला में स्कूल के दिनों से आज-तक को उन्होंने इस अन्दाज़ से पिरोया है, कि जो भी शिमला पर उनकी ये कविताएँ पढें, दीवाना हो जाए। उनकी नज़रों में शिमला एक जादुई शहर है, अगर यहाँ से किसी ने  भागना भी चाहा, तो देवदारुओं ने उसे अपनी बाहों में भीँच लिया, शिमला का बन्दर उन्हें पहली नज़र में अरस्तु लगता है, लेकिन हाथ से लिफाफा लपकते ही पता चलता है कि वह तो शिमला का बिग़ड़ैल बन्दर है । यहाँ अपने सपने सच करने आए बच्चे भी अवतार की नज़र से नहीं बचते और कवि को तब निराशा होती है, जब शिमला के घर द्वार इन बच्चों के लिए एक सपना ही बन कर रह जाते हैं ।
                                 इन बच्चों के बारे में बे कहते हैं कि :

"सपने तो लिए
उन्होंने पकड़
फिर भी
शिमला की छतें
घर-द्वार
उनके सपनों में बसे रहे।"

                             वहीं अवतार ने शिमला शहर को एक ऐसे जादुई शहर के रूप में देखा है, जहाँ बरसों पुराने मित्र अचानक आकर मिल जाते हैं। शिमला पर उनकी एक और कविता देखिए:

"थका हारा
बनवासी ईश्वर
यदि कहीं
कभी
लौटकर आएगा
तो इसी शहर के
किसी देवदार तले
पनाह पाएगा।"

                            इस कविता से अवतार एनगिल के कवि का एक और रूप झलकता है:

" हे दर्पण !
सभी कहते हैं
तुम झूठ नहीं बोलते
फिर भला
दायें को बायाँ
बायें को दायाँ
क्यों बताते हो ?" 

कविता पाठ करते अवतार एनगिल
संग्रह में दर्पण पर उनकी और कविताएँ भी ध्यान खीँचती हैं।

                चार खण्डों के इस कविता संग्रह का टाईटल खण्ड ‘बाघ की वापसी’ पढ़ने योग्य है। इस खण्ड को पढ़कर हाल ही में दिल्ली में हुए  गैंग रेप की वीभत्स तस्वीर तो सामने आती ही हैं, साथ ही साथ हमारी व्यवस्था पर भी बाघ के ज़रिये कवि ने व्यंग्य बाण छोड़े हैं। अवतार एनगिल की कविता का असली रंग इन कविताओं को पढ़कर ही चढता है। 
                         
                       बाघ पर उनकी ये पंक्तियाँ देखें:

" तीसरे पहर की प्रखर धूप में
कालेज से लौटती लड़की
बेहद त्रस्त है

उसे लगता है
उसका ‘भगवान जी’ भी
बाघों से डर गया है
जाने कहाँ प्रवास कर गया है

और...
सारा बाज़ार बाघों से भर गया है
सारा बाज़ार बाघों से भर गया है।"

                       उनकी बाघ पर एक और कविता की पंक्तियाँ कुछ इस 
 तरह है:

बाघ ने मेमने से कहा :
पह्ले मेरे अगले पंजे बांध दो
फिर मीडिया वालों को फोन लगाओ
आज, हम-तुम
संग-संग फोटो खिंचवाएँगे
सभी चैनलों वाले
उसे दिखाएँगे ।

                       ग़ज़ाला शीर्षक से प्रकाशित उनकी कविता तो मानो दिल्ली में हाल ही के दर्दनाक गैंगरेप का बखान करती हो,यद्यपि यह कविता घटना के कई दिनों पहले लिखी गई है। कविता कुछ यूँ है :

कल :
सुन्दरवन में
तीन शेरों ने
एक मृगी को धर-दबोचा
और सिंहनाद किया
आज :
राजधानी के राजपथ पर चलती ग़ज़ाला
आखिरी बार
उस लम्बी गाड़ी के निकट से निकलती देखी गई
पुलिस को
अभी तक
शेर सिंह, शेर खाँ और शैरी टाईगर की तलाश है।

                          अवतार एनगिल का कविता संग्रह पढ़ते- पढ़ते, शिमला की सर्द हवाएँ गर्म हो गईं, मैं किताब सिरहाने रख सोने लगा हूँ.... अरे... सुबह के तीन बज गए हैं.... ! 

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डाक खर्च 50 रुपये अतिरिक्त । 








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