बुधवार, 12 नवंबर 2008

जब हों जेबें खाली.......


जब हों जेबें खाली साहब।
फिर क्या ईद दीवाली साहब।

तिनका - तिनका जिसने जोड़ा,
वो चिडिया डाली-डाली साहब।

सब करतब मजबूरी निकलेँगे,
जो बंदर से आंख मिला ली साहब।

कंक्रीटी भाषा बेशक सबकी हो,
पर अपनी तो हरियाली साहब।


मौसम ने सब रंग धो दिये,
सारी भेडें काली साहब।

आधार की बातें, सब किस्से उसके,
दो बैंगन को थाली साहब।

जब अच्छे से जांचा - परखा,
सारे रिश्ते जाली साहब।


(इस गज़ल को दोबारा इस लिये पोस्ट कर रहा हूं क्योंके एक काबिले गौर शेर इससे छूट गया था, पठकों की बेबाक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी )

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