सोमवार, 13 अप्रैल 2009

सोचा भी न था कि ब्लॉगिंग का ये ईनाम मिलेगा!

डिप्रैशन में हूँ,परेशान हूँ लज्जित भी। मैंने जिस भाषा को अपनी कल्पना से भी दूर रखा, उसी भाषा का इसतेमाल करने का आरोप मुझ पर लगाया जाए तो भला एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए इससे बड़ी शर्मिंदगी की बात क्या हो सकती है। एक लेखक को लिखने की इतनी बड़ी सज़ा मिलती है तो मुझे इस अंतरजाल के मायाजाल में नहीं फंसना। लिखने और अपने लिखे को पाठकों तक पहुँचाने के और मंच भी तो होते हैं। मेरे खिलाफ किए जा रहे दुःष्प्रचार को आप यहाँ से देख सकते हैं। आप में से बहुत से ब्लॉगर तो मुझे अच्छी तरह जानते और पहचानते हैं, अब फैसला आप पर छोड़ता हूँ आप ही फैसला करें कि जिस प्रकार के इल्ज़ाम मुझ पर लगाए गए हैं क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ। ये उन शरारती तत्वों की एक घिनौनी हरकत है जो मेरे उस कमैंट से परेशान हैं जो मैने हरकीरत हकीर की नज़्म चोरी होने की उनकी शिकायत पर अपने विरोध जताते हुए किये थे। कितनी पीड़ा के बाद कोई लेखक अपनी रचना लिखता है उस रचना में लगे श्रम का महत्व लेखक ही जानता है। किसी रचनाकार की रचना को चुराने का विरोध करना अगर गुनाह है तो मैने गुनाह किया है। और मेरा यह विरोध जारी भी रहेगा। लेकिन मुझ पर उन शब्दों का प्रयोग करने का इल्ज़ाम बिल्कुल निराधार है जो "भड़ास" ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया है। लेकिन मुझ पर फैंके गये इस कीचड़ से बहुत आहत हूँ और ब्लॉगिंग की इस दुनिया से विदा लेने के निर्णय पर विवश हूँ। अगर आप इसे मेरी हार मानते हैं तो मैं अपनी हार भी स्वीकार करता हूँ यह किसी और के साथ भी होने वाला है अगर हम लेखन के इस "आतंकवाद" को बर्दाश्त करके ही लिखना है तो मैं इसमें नहीं जीना चाहता। मुझे विदा लेनी है। क्षमा याचना के साथ!


सादर!
आपका

प्रकाश बादल।

मेरी ये रचना उन सभी चिंतकों के प्रति अंतर्जाल पर् अंतिम प्रस्तुति के रूप में प्रस्तुत है। क्योंकि ऐसा लगता है कि यह रचना इसी समय के लिए फिट बैठ रही है।:


कई रोज़ हो बेशक ठहरे आवाज़ों के बीच।

क्या माने रखते हैं बहरे आवाज़ों के बीच॥


चुपके से वो सन्नाटों में ज़हर घोल कर चले गये,

आप दे रहे हैं पहरे आवाज़ों के बीच।


अपनी शरारतों पर हम सूरज को कोस रहे,

बेमौसम क्यों जलीं दोपहरें आवाज़ों के बीच।


बारूद और बर्बादी से आगे ही हैं फैल रहे,

नफरत के जो भाव हैं गहरे आवाज़ों के बीच।


जो कटता है कट जाने दे जो घटता है घट जाने दे,

जीना है तो कुछ मत कह रे आवाज़ो के बीच।

श्री प्रेम भारद्वाज की रचना की दो पंक्तिया भी यहाँ सही बैठ रही है।

"सच कहने की जो अपनी आदत है।

उनके शब्दकोश में बग़ावात है।"

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