नज़्म,कविता,शेर, ग़ज़ल उसका चेहरा।
लहलहाती एक फसल उसका चेहरा।
वो मुझको तो अपना सा ही लगता है,
चाहे असल हो या नकल उसका चेहरा।
हर दिल को मुमताज़ कर दे पल भर में,
शहाजहाँ का ताजमहल उसका चेहरा।
घड़ी भर को ही तो हम ठहरे थे,
समय जैसे गया निकल उसका चेहरा।
दरिया में कंकर जैसे कोई मार गया,
गौर से देखो ऐसी हलचल उसका चेहरा।
मंहगाई में ग़रीबों से सब धंसते जाएं,
नहीं है वैसा, पर है दलदल उसका चेहरा,
फुटपाथ पर कई रोज़ के भूखे सा मैं,
इसी भूख में आटा- चावल उसका चेहरा।
पल भर में है रविवार की छुट्टी सा और,
पल में होता सोम-मंगल उसका चेहरा।
मंहगाई भत्तों की आस में बाबू से सब,
सियासी झाँसे सा चपल उसका चेहरा।
रस्ता भूलूँ उसमें, या फिर लुट जाऊँ मैं,
मुझको लगता है इक चंबल उसका चेहरा।
