स्कूल डायरी से एक और ग़ज़ल आपकी नज़र कर रहा हूँ:
कई रोज़ हो बेशक ठहरे आवाज़ों के बीच।
क्या माने रखते हैं बहरे आवाज़ों के बीच॥
चुपके से वो सन्नाटों में ज़हर घोल कर चले गये,
आप दे रहे हैं पहरे आवाज़ों के बीच।
अपनी शरारतों पर हम सूरज को कोस रहे,
बेमौसम क्यों जलीं दोपहरें आवाज़ों के बीच।
बारूद और बर्बादी से आगे ही हैं फैल रहे,
नफरत के जो भाव हैं गहरे आवाज़ों के बीच।
जो कटता है कट जाने दे जो घटता है घट जाने दे,
जीना है तो कुछ मत कह रे आवाज़ो के बीच।
कई रोज़ हो बेशक ठहरे आवाज़ों के बीच।
क्या माने रखते हैं बहरे आवाज़ों के बीच॥
चुपके से वो सन्नाटों में ज़हर घोल कर चले गये,
आप दे रहे हैं पहरे आवाज़ों के बीच।
अपनी शरारतों पर हम सूरज को कोस रहे,
बेमौसम क्यों जलीं दोपहरें आवाज़ों के बीच।
बारूद और बर्बादी से आगे ही हैं फैल रहे,
नफरत के जो भाव हैं गहरे आवाज़ों के बीच।
जो कटता है कट जाने दे जो घटता है घट जाने दे,
जीना है तो कुछ मत कह रे आवाज़ो के बीच।
