आज अचानक एक डायरी हाथ लगी, जो उस समय की थी जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उस डायरी में कई रचनाएं मिली जिनमेंसे अधिकतर खारिज कर दी लेकिन कुछ मुझे अच्छी लगीं उनमें से एक रचना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ आपकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा रहेगी: (प्रकाश बादल)
कटे हुए पर लिए घूमती है।
हवाएं खंजर लिए घूमती है।
जिस ज़िन्दगी का तुम्हें भरोसा है,
मौत हथेली पर लिए घूमती है।
दरअसल है बुराई उसी की रगों में,
जो दुनिया तीन बंदर लिए घूमती है।
आपकी नज़र में होगा तिनका वो,
चिड़िया चोंच में घर लिए घूमती है।
फिर धुंध ने किया पहाड़ियों का अपहरण,
झुग्गियाँ बाढ़ का डर लिए घूमती हैं।
कटे हुए पर लिए घूमती है।
हवाएं खंजर लिए घूमती है।
जिस ज़िन्दगी का तुम्हें भरोसा है,
मौत हथेली पर लिए घूमती है।
दरअसल है बुराई उसी की रगों में,
जो दुनिया तीन बंदर लिए घूमती है।
आपकी नज़र में होगा तिनका वो,
चिड़िया चोंच में घर लिए घूमती है।
फिर धुंध ने किया पहाड़ियों का अपहरण,
झुग्गियाँ बाढ़ का डर लिए घूमती हैं।
