इस कदर भी उजाले न हो।
घर आग के निवाले न हो।
प्यासे हलक से गुज़रे न जब तलक,
नदी समन्दर के हवाले न हो।
बोल प्यार के हों ग़ज़ल की राह में,
मस्जिद न हो और शिवाले न हो।
सूरज अबके ऐसी भी धूप न बाँटे,
कि पहाड़ पर बर्फ़ के दुशाले न हो।
खुशियों की मकड़ियों का वहाँ गुज़र नहीं,
ग़मों के जिस घर में जाले न हो।
इस हमाम में सब नंगे नज़र आएंगे।
सच की ज़बान पर जो ताले न हो।
घर आग के निवाले न हो।
प्यासे हलक से गुज़रे न जब तलक,
नदी समन्दर के हवाले न हो।
बोल प्यार के हों ग़ज़ल की राह में,
मस्जिद न हो और शिवाले न हो।
सूरज अबके ऐसी भी धूप न बाँटे,
कि पहाड़ पर बर्फ़ के दुशाले न हो।
खुशियों की मकड़ियों का वहाँ गुज़र नहीं,
ग़मों के जिस घर में जाले न हो।
इस हमाम में सब नंगे नज़र आएंगे।
सच की ज़बान पर जो ताले न हो।
